ओस सुबह
पत्तियों पर गोल
चमके खूब।
फसलें हरीं
मनभावन आस
आँखें देखतीं।
अशोक बाबू माहौर
पत्तियों पर गोल
चमके खूब।
फसलें हरीं
मनभावन आस
आँखें देखतीं।
अशोक बाबू माहौर
Navankur sahitya Sabha
काव्य गोष्ठी एवं पुस्तक लोकार्पण समारोह:-
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