पुरानी बात
उतरती मन में
झकोरे तन |
लालच बला
फिर भी भाती मन
दुखता तन |
अशोक बाबू माहौर
काशी काव्य गंगा साहित्यिक मंच वाराणसी पंजीकृत की 188 वीं गोष्ठी शनिवार को मेरे कार्य…
साहित्यधर्म मंच