धरती हरी
लहरा रही घास
मन भावन |
संकट बढ़ा
उदास हुए लोग
जान जोखिम |
अशोक बाबू माहौर
गर्मी का कहर: बढ़ती तपिश और हमारी जिम्मेदारी
साहित्यधर्म मंच