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सुधीर श्रीवास्तव की दो कविताएँ


परमहंस


मन ,वचन, कर्म से

पवित्र है जो,

नीति, नियम, धर्म का

भाव जिसमें है,

लोभ, मोह से मुक्त हो,

दया,करुणा से युक्त हो

समभाव का गुण हो जिसमें

चाल,चरित्र ,चेहरे में

समग्रता ,सद्व्यवहार लिए

भय, क्रोध, लालच से

मुक्त है भक्तिभावी

ज्ञान की गंगा में

नित स्नान करे,

देता ही रहे सबको

लेने की भावना न रखे

निंदा, नफरत, ईर्ष्या से

कोसों दूर हो,

जाति,पंथ,धर्म, मजहब

ऊँच नीच का भेद न करे,

आत्मज्ञानी, तत्वदर्शी

परमसत्ता से संबद्ध हो

हरहाल में सम हो जो

मन से वैरागी हो

तन से साधुसम

सभी जीवात्मा में

देखता हो ईश्वर को

ऐसा पुण्यात्मा ही

ईश्वर का दूत बन धरा पर

जीवन बिताता है

परमहंस कहलाता है।


 गाँव की गलियां


समयचक्र और

आधुनिकता की भेंट

चढ़ गईं हमारे गाँव की गलियां,

लगता ऐसे जैसे कुछ खो सा गया है,

अपनापन गलियों में भी

जैसे नहीं रह गया  है।

धूल,मिट्टी और कीचड़ भरी गलियों में

अजीब सी कशिश थी,

कंक्रीट के साथ जैसे

वो कशिश, अपनेपन की खुशबू भी 

जैसे दफन हो गई है।

अब तो गाँवों की गलियों में भी

बच्चों का शोर ,हुड़दंग और

आपस का द्वंद्व ,शरारतें

गुल्ली डंडा और कंचे खेलना,

अंजान शख्स के दिखते ही

कुत्तों का भौंकना,

खूंटे से बंधे जानवर का 

रस्सी तोड़कर गलियों में

सरपट भागना,

गलियों के मुहाने पर जगह 

उन्हें पकड़ने के लिए

लोगों का मुस्तैद हो जाना ।

बड़े बुजुर्गों के डर से

गली में चुपचाप छुप जाना,

चाचा,दादी,बड़ी मां के पीछे 

गली गली घूमकर

छुपते छुपाते घर में घुस जाना

जैसे जंग जीतने की खुशी का

अहसास करना

सब इतिहास हो गया,

गलियों का भी तो अब जैसे

केंचुल उतर गया।

गलियां भी अब वो गलियां

नहीं रह गई,

जहाँ घुसते ही जैसे

सुरक्षा और सुकून का ही नहीं

अपनों के बीच पहुंच जाने का

अहसास होता था,

अब सब कुछ बिखर सा गया है

गाँवों की गलियों को जैसे

आधुनिकता का भूत चढ़ गया है,

आज तो गाँव की गलियों में भी

बहुत भेद हो गया है,

इंसानी फितूर अब जैसे

गलियों को भी चढ़ गया है।

                   सुधीर श्रीवास्तव

                   गोण्डा, उ.प्र.

                   8115285921