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मेरे सद्गुरु

कवयित्री-ब्रम्हाकुमारी मधुमिता 'सृष्टि' की कलम से निकली हुई एक कविता.... 
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मेरे सद्गुरु
 

मन मेरे तू सिमर ले, सद्गुरु का नाम....
नाम से ही जिनके ,बन जाते कितने बिगड़े काम
तुम बिन ये जीवन था,
 कितना बेकार
दुख दर्द और कष्ट ,
की थी भरमार
राह ना कोई ,नजर आता
मन पंछी ,भटकता रहता
एक आस थी ,फिर भी, मन में
आएगी रौशनी, मेरे भी,जीवन में
आए जो, तुम, सद्गुरु
नवजीवन सा खिल उठे तरु
भटकते मन को ,शांत किया
जीवन को मेरे, नया अर्थ दिया
आपके ज्ञान प्रकाश को मैंने धारण किया
बाबा आपने मुझको ,जिय दान दिया
ज्ञान सूर्य उदित हुआ
अज्ञान अंधेरा दूर हुआ
ज्ञान की शीतलता से तमो प्रधान तपिश को शांत किया
मन मेरे तू सिमर ले सद्गुरु का नाम....
नाम से ही जिनके ,बन जाते कितने बिगड़े काम।

ब्रम्हाकुमारी मधुमिता 'सृष्टि'
 पूर्णिया (बिहार)

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