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मेरे लेखन की दूसरी पारी- सुधीर श्रीवास्तव

 मेरे लेखन की दूसरी पारी



माँ शारदे की बड़ी कृपा हुई कि पिछले बीस बाइस वर्षों से बंद चल रहा मेरा लेखन कोरोना के बीच पक्षाघात झेलने के बाद फिर आखिरकार शुरु हो ही गया।ऐसा विभिन्न समूहों पर लाइव काव्य पाठ सुनते और पटलों पर लोगों की रचनाओं को पढ़ते रहने के कारण हुआ।फिर जब एक बार लेखन शुरु हुआ, तो फिर मैंंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।अभी तक मैं सात सौ से अधिक विभिन्न विधा की रचनाओं का सृजन इन बीच में कर चुका हूँ।यही नहीं 600 से अधिक मेरी रचनाएँ देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं,बेवसाइट, ब्लागस,एप्स में छप चुकी हैं,जो अनवरत जारी है।

अमेरिकी सा.पत्र हम हिंदुस्तानी में भी कई रचनाएं छप चुकी हैं।

इस बीच साहित्य संगम संस्थान असम इकाई का अधीक्षक बनने के अलावा, साहित्यिक आस्था परिवार का रा.उपाध्यक्ष, नव साहित्य परिवार भारत एवं साहित्यकोष (राष्ट्रीय साहित्यिक मंच) के संरक्षक के अलावा प्रयागराज कल्चरल सोसायटी के महासचिव, साहित्य प्रकाश रचना मंच का अधीक्षक, सामयिक परिवेश एवं कुछ बात कुछ जज़्बात मंच का मीडिया प्रभारी होने के साथ ही  अतिरिक्त अनेक साहित्यिक संस्थाओं में अपरोक्ष जिम्मेदारी के अलावा भी योगदान दे रहा हूँ। 

ईश्वरीय कृपा से जैन विश्वविद्यालय बैंगलुरू में 'भारतीय संस्कृति और बदलता परिवेश' विषय पर वक्तव्य देने के लिए मुझे सम्मानित भी किया गया।

सा.सं.सं. द्वारा 'संगम शिरोमणि' सहित अनेक 200 के करीब सम्मान पत्र के अलावा देश/विदेश के अलग अलग हिस्सों के अनेक  पटलों/मंचों से भी मिले सम्मान सहित 1100 से अधिक राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय सम्मान पत्र  जुलाई'2020 से अब तक मिल चुके हैं।

अनेक लाइव काव्यपाठ और कवि गोष्ठियों करने का अवसर मिला,जो कि अनवरत जारी है।

कुछेक कवि गोष्ठियों की अध्यक्षता करने का भी अवसर इसी के मध्य मिला।आज देश का शायद ही कोई हिस्सा है जहां लोग मुझे नाम से न जानते हो,विदेश में भी पहचान बनने लगी है। देश विदेश से रचनाओं पर प्रतिक्रिया भी मेरे हौसले को बढ़ा रही है।

एक अन्य सौभाग्य यह भी कि मेरे लेखन की बदौलत मुझे देश के कुछ ऐसे लोग मुझसे मिले जिनसे अपने परिवार सा प्यार,दुलार अनवरत मिल रहा है।अनेक लोगों से मेरा संवाद  होता रहता  है।जो मेरे लिए प्रेरणा दायक भी होता है,कुछ सीखने को भी मिलता है।अनेक नवोदितों को प्रेरित कर आगे बढ़ाने का भी काम जारी कर रखा है,जो मुझे निजी सूकून देता है।क्योंकि उन्हें जब आगे बढ़ते देखता हूँ तो जो आत्मिक खुशी मिलती है,उसकी अभिव्यक्ति करना मुमकिन नहीं है।

मुझे देश के अलग अलग हिस्सों के  नये नये लोगों से बात करना, उनसे कुछ सीखना,अपने अनुभव बाँटना अच्छा लगता है।जिसका लाभ यह कि आज देश के  विभिन्न हिस्सों से ऐसे ऐसे लोगों का स्नेह, आशीर्वाद ही नहीं प्रेरणा और मार्गदर्शन मेरी सफलता के कारणों में शामिल हैं।जिनमें आ.गोपाल सहाय श्रीवास्तव(अहमदाबाद),आ.जय प्रकाश नारायण (आसनसोल), आ.राजेंद्र श्रीवास्तव(प।बंगाल),वरिष्ठ कवि डा.अशोक पाण्डेय 'गुलशन' (बहराइच,उ.प्र.), साहित्यिक आस्था परिवार के परिनियामक आ. कुसुम हिंदू और अध्यक्ष/कवि आ.दुर्गेश दुर्लभ ,जैन(संभाव्य )विश्वविद्यालय बेंगलुरु की हिंदी विभाग की अध्यक्षा आ.राखी के.शाह, हिंददेश परिवार की संस्थापिका/अध्यक्षा बहन डा.अर्चना पाण्डेय'अर्चि', बड़े भाई का सा सम्मान दे रही छोटी बहन,साहित्यकार आ.ज्योति सिन्हा (मुजफ्फरपुर), हमारे शुभचिंतक, प्रेरक मार्गदर्शक, कलम के धनी आ. बजरंग लाल केजड़ीवाल (तिनसुकिया) ,वरि. साहित्यकार आ. टेकूवासवानी (मस्कट) और हमारे मित्र वरिष्ठ पत्रकार, कवि आ.अमित कुमार बिजनौरी(संस्थापक-नव साहित्य परिवार,बिजनौर, उ.प्र.),आ.महेंद्र सिंह राज (चंदौली, उ.प्र.) हमारे लाड़ले प्रिय अनुज  अंकुर सिंह(जौनपुर,उ.प्र.), साहित्य उन्नयन समूह की सचिव हमारी बहन आ. स्मिता श्रीवास्तव(नोएडा), छोटी बहन / प्रखर कवयित्री आ. ममता रानी सिन्हा, तोपा रामगढ़, झारखंड,आ.

नंदिनी लहेजा,झारखंड, आ. हँसराज सिंह हँस (प्रयागराज),बहुआयामी व्यक्तित्व  बहन आ.आराधना प्रियदर्शिनी (चेन्नई) , ममता श्रवण अग्रवाल(सागर), तृप्ति वीरेंद्र गोस्वामी काव्यांशी, निर्मला सिन्हा(छत्तीसगढ़)संगीता चौबे पंखुड़ी (अबूहलीफा, कुवैत), सरिता सिंह (गोरखपुर),श्वेता विष्ट,ममता जोशी, अंशी कमल(उत्तराखंड),आ.टेकू वासवानी (मस्कट),आ.पल्लवी भुइँया, आ.मंजूरी डेका, बड़ी बहन आ.रंजना बिनानी (असम) आ.रजनी हरीश (तमिलनाडु),आ.ओम प्रकाश श्रीवास्तव (कानपुर),आ.अशोक कुमार जाखड़.(हरियाणा),आ.रईस सिद्दीकी, अनुज आ.अभिषेक मिश्रा(बहराइच), प्रमोद यादव, विवेक अज्ञानी, सानंद सरगम (गोण्डा) , देवेश मिश्रा एवं ऋचा मिश्रा (बलरामपुर),आ.नितिन निश्छल (सीतापुर) एवं अग्रज स्व.श्रीकांत निश्छल जी व अनुज स्व. नीरज अवस्थी सहित अन्याय की अहम भूमिका, स्नेह, आशीष और यथा प्रेरक भूमिकाएं मेरे लिए ईश्वर के वरदान जैसा है।

संक्षेप में सिर्फ़ इतना कि माँ की असीम कृपा का ऐसा असर हुआ कि जो नाम, मान, सम्मान, पहचान मुझे इतने समय में मिला, मुझे दस सालों में भी मिलने की उम्मीद नहीं थी। कुछ ऐसा भी हुआ जिसकी कल्पना भी मेरे लिए असंभव थी। 

बस इतनी सी है मेरी दूसरी पारी की साहित्यिक यात्रा का अल्प अनुभव।

अंत में सिर्फ़ इतना ही कहूँगा कि खुद पर भरोसा रखिये और अपने को ऐसा बनाने की हरदम कोशिश करते रहें कि पद और सम्मान आपका पीछा करने को बाध्य हो जाय। 

आप सभी के स्नेह ,प्यार, दुलार, आशीर्वाद की सतत आकांक्षा के साथ

 जय माँ शारदे, शत शत नमन वंदन।

   

      सुधीर श्रीवास्तव

        गोण्डा, उ.प्र.

      8115285921