रिश्तों की बढ़ती दूरियाँ

 

ज के आधुनिक दौर में इंसान तकनीक के करीब और अपनों से दूर होता जा रहा है। मोबाइल और सोशल मीडिया ने बातचीत को आसान तो बनाया है, लेकिन दिलों के बीच की दूरी बढ़ा दी है। एक ही घर में रहने वाले लोग भी अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त दिखाई देते हैं। साथ बैठकर बातचीत करने का समय धीरे-धीरे कम ही होता जा रहा है।



रिश्ते केवल खून के संबंधों से मजबूत नहीं होते, बल्कि उनमें समय, विश्वास, अपनापन और संवाद की भी आवश्यकता होती है। छोटी-छोटी गलतफहमियाँ जब बातचीत के अभाव में बढ़ती जाती हैं, तो रिश्तों में खामोशी और दूरी जन्म लेने लगती है। कई बार अहंकार भी रिश्तों को कमजोर करते देखा है।

जरूरत इस बात की है कि हम अपने व्यस्त जीवन में अपनों के लिए थोड़ा समय निकालें। उनकी बात सुनें, उनकी भावनाओं को समझें और छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना सीखें। एक फोन कॉल, स्नेह भरी बातचीत या साथ बैठकर बिताए कुछ पल रिश्तों में फिर से गर्माहट ला सकते हैं।

रिश्ते जिंदगी की सबसे बड़ी पूँजी हैं। इन्हें बनाए रखने के लिए समय और प्रयास दोनों जरूरी हैं। क्योंकि दूरियाँ बढ़ने में समय नहीं लगता, लेकिन उन्हें मिटाने में पूरी जिंदगी लग सकती है। हमें सोचना चाहिए और समझना भी।

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