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कविता
बत्तखें पानी में (Battkhen pani men Ashok babu mahour)
बत्तखें पानी में (Battkhen pani men Ashok babu mahour)
saahitya dharm
बत्तखें
पानी में
तैरती
शोर मचाती
गाती गुनगुनाती
जैसे जमा ली महफिल
स्वरों की
प्यारी, मधुशाला सी।
घास हिलोरे ले
नृत्य करती
निशब्द सी
होंठ चलाती
मोटे पतले
खूब झकझोरती बदन अपना
मन अपना
निसंकोच
यूंही
वैसे ही
जैसे वर्षों पुरानी
मंद बुध्दि।
अशोक बाबू माहौर
पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है
पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है
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lekh
गर्मी का कहर: बढ़ती तपिश और हमारी जिम्मेदारी
saahitya dharm
जून 18, 2026
गर्मी का कहर: बढ़ती तपिश और हमारी जिम्मेदारी
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