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कविता
बत्तखें पानी में (Battkhen pani men Ashok babu mahour)
कविता
बत्तखें पानी में (Battkhen pani men Ashok babu mahour)
saahitya dharm
दिसंबर 09, 2018
बत्तखें
पानी में
तैरती
शोर मचाती
गाती गुनगुनाती
जैसे जमा ली महफिल
स्वरों की
प्यारी, मधुशाला सी।
घास हिलोरे ले
नृत्य करती
निशब्द सी
होंठ चलाती
मोटे पतले
खूब झकझोरती बदन अपना
मन अपना
निसंकोच
यूंही
वैसे ही
जैसे वर्षों पुरानी
मंद बुध्दि।
अशोक बाबू माहौर
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