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कविता
उड़ जाना
उड़ जाना
saahitya dharm
हे! बूँद
ओस की
तुम बैठ तो गयी
ड़ालियों पर
मगन होकर
पर सुबह उड़ जाना
हठ जाना
या जमीन पर बिखर जाना
सौंधी सौंधी खुश्बू फैलाना
क्योंकि रवि उदय होते ही?
जला देगा
भाप कर देगा
तन
मन
और अस्तित्व तुम्हारा।
अशोक बाबू माहौर
पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है
पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है
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गर्मी का कहर: बढ़ती तपिश और हमारी जिम्मेदारी
saahitya dharm
जून 18, 2026
गर्मी का कहर: बढ़ती तपिश और हमारी जिम्मेदारी
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