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कविता
बस थोडे़ से (Bas Thode se)
बस थोडे़ से (Bas Thode se)
saahitya dharm
बस थोडे़ से
दिन और ही सही
घर रहेंगे
खाना बनाना
सीख जायेंगे
झाडू पौछा भी
आप यूँहीं बैठे
मेरे काम देखते रहना
उत्साह बढाते रहना
क्योंकि हम अब अजीब बन जायेंगे?
रेंगते कीड़े की तरह चलेंगे
सुबह दोपहर शाम!
अशोक बाबू माहौर
पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है
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गर्मी का कहर: बढ़ती तपिश और हमारी जिम्मेदारी
saahitya dharm
जून 18, 2026
गर्मी का कहर: बढ़ती तपिश और हमारी जिम्मेदारी
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