फूल
मुरझाया हुआ
ड़ाली पर
ड़ाली
नादान सी
समेटे हाथ
झुकी
भिखारी सी
जैसे माँगती भीख
हवा से
आहिस्ता आहिस्ता |
अशोक बाबू माहौर
फूल
मुरझाया हुआ
ड़ाली पर
ड़ाली
नादान सी
समेटे हाथ
झुकी
भिखारी सी
जैसे माँगती भीख
हवा से
आहिस्ता आहिस्ता |
अशोक बाबू माहौर
भुलक्कड़ बनारसी
काशी काव्य गंगा साहित्यिक मंच वाराणसी पंजीकृत की 191 वीं गोष्ठी शनिवार को मेरे कार्य…
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