फूल
मुरझाया हुआ
ड़ाली पर
ड़ाली
नादान सी
समेटे हाथ
झुकी
भिखारी सी
जैसे माँगती भीख
हवा से
आहिस्ता आहिस्ता |
अशोक बाबू माहौर
फूल
मुरझाया हुआ
ड़ाली पर
ड़ाली
नादान सी
समेटे हाथ
झुकी
भिखारी सी
जैसे माँगती भीख
हवा से
आहिस्ता आहिस्ता |
अशोक बाबू माहौर
सम्मान
काशी काव्य गंगा साहित्यिक मंच वाराणसी पंजीकृत में देहरादून से पधारे वरिष्ठ साहित्यका…
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